Monday, August 29, 2011

मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा.....


अगर अन्ना के साथ इतने लोग जुड़े तो ये समझा जा सकता है अन्ना की सोच एक आम आदमी के जैसी ही है / यकीनन../ अन्ना एक साधारण व्यक्ति हैं जो किसी काम को असाधारण तरीके से करते हैं / लोगों की ज़रूरतों, परेशानियों और आशाओं को समझ कर एक प्रयास शुरू करना और उसे आम आदमी से जोड़ कर सफल बनाना एक असाधारण व्यक्तित्व का करिश्मा ही हो सकता है / आप-हम किसी चीज़ से परेशान हो कर, खीज कर या मन मसोसकर रह जाते हैं....ज्यादा से ज्यादा दो बात सामने वाले को सुना कर, भन-भनाते हुए घर चले आते हैं...अन्ना जैसे लोग घर नहीं आते अपितु उस बुराई को दूर करने के लिए घर का सुख छोड़ देते हैं./.इसीलिए अन्ना जैसे लोग पूज्यनीय हो जाते हैं / हो सकता है अन्ना में भी कोई बुरी बात हो..तो क्या ! आप-हम जो अच्छा सोचते हैं और अच्छा करना चाहते हैं...आपमें और हम में भी तो कमियां हैं /

खैर ! जो मैं सोचता था वो अन्ना ने कर दिखाया.......

उदाहरण के तौर पर, मुझे कोफ़्त होती थी जब सरकारी तंत्र किसी मकान को इसलिए गिरा देता था क्योंकि वो गैर-कानूनी तरीके से बना था / नुकसान आम आदमी का होता था / मैं ये सोचता था कि अगर कोई मकान गलत तरीके से बना है तो सबसे पहले उस व्यक्ति को सज़ा होनी चाहिए जिसने अपने हस्ताक्षर से इस गलत निर्माण की अनुमति दी / सामने बैठा व्यक्ति, पैसा लेकर कुछ भी कर दे, जो उसके कार्यछेत्र में है ही नहीं, और उससे कोई पूछ-ताछ भी ना हो तो वो तो गलत करता ही जाएगा / भाई, चोर चोरी करने से तो डरता नहीं...वो तो पकडे जाने से डरता है..! जब आपको ये डर सताएगा कि आज या आज से दस साल बाद भी आपके गलत काम के बारे में पता चला तब भी मुझे सज़ा हो सकती है तो क्या हर कर्मचारी इस बात से डरेगा नहीं ? गलत काम करने से रुकेगा नहीं ? घूस लेने से घबराएगा नहीं ? वक्त पर काम करेगा नहीं ? जन लोकपाल में यही कुछ तो है / समय सीमा के अंदर ईमानदारी से हर कार्य हो और अगर गलत करते हुए पकडे गए तो जवाबदेही तुम्हारी और सजा भी तुम्हें /

अब अन्ना ने और एक सवाल उठाया है जो मैंने पिछले इलेक्शन के बाद अपने इसी ब्लॉग में लिखा था / आप कहते हैं वोटिंग का अधिकार है हमारा और हमें वोट करना चाहिए / माना सत्य है ये / परन्तु हमें पूरी आज़ादी से ये हक दो तब तो बात बने ! अभी तो ऐसे क़ानून हैं कि अगर दस असामाजिक तत्त्व भी इलेक्शन में खड़े हो जाएँ, तब भी हमें आज़ादी नहीं है कि हम कह सकें कि हमें इनमें से कोई पसंद नहीं हैं / या तो इसे बदलो या जनता को ये अधिकार दो कि वो कहें कि इनमें से कोई नहीं / जो मुद्दा अन्ना ने उठाया है अभी / इसी के साथ मैं ये भी सोचता हूँ कि वही इलेक्शन वैध्य माना जाए जिसमे 90 % वोट पड़ें हो / सिर्फ 35-45 % वोट के आधार पर कैसे कोई मान ले कि चुना गया व्यक्ति जन-प्रतिनिधि है /

अन्ना ने बहुत ज्याद कुछ नहीं किया है / उन्होंने जनता की आवाज़ बन कर ये कहा सांसदों को कि अभी वो करो जो ज़रूरी है और जिसके लिए तुम्हें भेजा गया है / बहुत हो गयी मनमानी / तुम मालिक नहीं सेवक हो इसलिए वो करो जो देशहित में हो / सेवक जब मालिक हो जाए और रक्षक ही भक्षक तो अराजकता फैलती है / इसे बंद करो और आगे भी कोई ऐसा ना करे इसलिए ठोस कानून लाओ / जय हिंद /